नई दिल्ली, दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट और साइबर धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे मामलों में आरोपियों को आसानी से जमानत नहीं दी जाएगी। शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल असाधारण परिस्थितियों (Extraordinary Grounds) में ही राहत पर विचार किया जाएगा। कोर्ट ने इन अपराधों को विशेष रूप से बुजुर्गों के खिलाफ होने वाले सबसे गंभीर अपराधों में से एक बताया और कहा कि इन्हें लूट तथा डकैती जैसे संगीन अपराधों की श्रेणी में देखा जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सोमवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर अपराध लोगों, खासकर वरिष्ठ नागरिकों, की जीवनभर की मेहनत की कमाई को निशाना बनाते हैं। अदालत ने कहा कि अपराधी लोगों को झूठे मामलों, जांच या गिरफ्तारी का डर दिखाकर उनकी जमा पूंजी हड़प लेते हैं, जिससे पीड़ितों को भारी आर्थिक और मानसिक नुकसान उठाना पड़ता है।
सुनवाई के दौरान एक आरोपी की ओर से दलील दी गई कि उसने केवल मुख्य आरोपी के लिए बैंक खाता खुलवाने में मदद की थी और वह एक वर्ष से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने अपराध को अंजाम देने में किसी भी प्रकार की सहायता की है, तो उसे भी अपराध में सहभागी माना जाएगा। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी।
पीठ ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड के मामलों में तब तक जमानत नहीं दी जाएगी, जब तक आरोपी अपनी रिहाई के लिए कोई असाधारण और ठोस आधार प्रस्तुत न करे। अदालत ने यह संदेश निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों तक भी पहुंचाया कि ऐसे मामलों में जमानत पर फैसला करते समय अपराध की गंभीरता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट डिजिटल अरेस्ट और साइबर अपराधों पर चिंता जता चुका है। अदालत ने कहा था कि ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को संगठित अपराध से संबंधित कड़े कानूनों के इस्तेमाल पर भी विचार करना चाहिए। न्यायालय का मानना है कि डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराध अब केवल साइबर धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि ये संगठित अपराध का रूप ले चुके हैं।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य रूप से वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाने वाले डिजिटल अरेस्ट मामलों का स्वतः संज्ञान लिया था। इसके बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को देशभर में ऐसे मामलों की जांच का जिम्मा सौंपा गया था। साथ ही विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए एक अंतर-विभागीय तंत्र को सक्रिय करने के निर्देश भी दिए गए थे।
जांच एजेंसियों के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट और साइबर धोखाधड़ी के जरिए अब तक देशभर में लोगों से लगभग ₹3,000 करोड़ की ठगी की जा चुकी है। लगातार बढ़ते ऐसे मामलों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त रुख साइबर अपराधियों के खिलाफ न्यायिक कार्रवाई को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है।
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