नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2003 में हुए एक दर्दनाक लिफ्ट हादसे में जान गंवाने वाले रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) के अधिकारी विपिन हांडा के परिवार को ₹3.01 करोड़ से अधिक का मुआवजा देने के राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के फैसले को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कहा कि किसी भी लिफ्ट का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के लिए सुरक्षा कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि एक मौलिक आश्वासन है और उसके रखरखाव में लापरवाही स्वीकार नहीं की जा सकती।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने ओटिस एलिवेटर कंपनी (इंडिया) लिमिटेड द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है। अदालत ने माना कि लिफ्ट के रखरखाव और सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी कंपनी की थी और इस दायित्व में कमी स्पष्ट रूप से सामने आई।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि लिफ्ट जैसी मशीनों का उपयोग आम लोग प्रतिदिन करते हैं और उनकी सुरक्षा पूरी तरह रखरखाव करने वाली एजेंसी पर निर्भर करती है। ऐसे में यदि किसी कंपनी के पास लिफ्ट के संचालन और मेंटेनेंस की जिम्मेदारी है, तो उसे सर्वोच्च स्तर की सावधानी बरतनी होगी। अदालत ने कहा कि जो संस्था किसी ऐसी मशीन का संपूर्ण रखरखाव करती है, जिसकी खराबी से लोगों की जान को खतरा हो सकता है, उसकी जिम्मेदारी सामान्य सेवा प्रदाता की तुलना में कहीं अधिक होती है।
यह मामला वर्ष 2003 का है, जब रॉ अधिकारी विपिन हांडा की एक लिफ्ट दुर्घटना में मौत हो गई थी। हादसे के बाद उनके परिवार ने न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। मामले की सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने ओटिस एलिवेटर कंपनी को सेवा में कमी का दोषी मानते हुए पीड़ित परिवार को ₹3.01 करोड़ से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया था। कंपनी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
हालांकि, शीर्ष अदालत ने कंपनी की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि रिकॉर्ड में उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट है कि रखरखाव संबंधी जिम्मेदारियों का समुचित निर्वहन नहीं किया गया। अदालत ने दोहराया कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा से जुड़े मामलों में कंपनियों को उच्च स्तर की जवाबदेही निभानी होगी और किसी भी प्रकार की लापरवाही गंभीर परिणामों का कारण बन सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आधुनिक इमारतों में लिफ्ट अब एक सामान्य सुविधा बन चुकी है और लाखों लोग प्रतिदिन इनका उपयोग करते हैं। ऐसे में लोगों का यह विश्वास होना स्वाभाविक है कि लिफ्ट पूरी तरह सुरक्षित है। यदि रखरखाव में चूक के कारण किसी की जान जाती है, तो संबंधित सेवा प्रदाता अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों और सार्वजनिक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इससे यह संदेश गया है कि लिफ्ट, एस्केलेटर और अन्य उच्च जोखिम वाली मशीनों का रखरखाव करने वाली कंपनियों को सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन करना होगा। साथ ही, किसी दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों और उनके परिवारों को उचित मुआवजा दिलाने के लिए अदालतें गंभीरता से हस्तक्षेप करेंगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जहां सेवा में लापरवाही के कारण किसी व्यक्ति की जान चली जाती है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि सुरक्षा से समझौता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता और सेवा प्रदाताओं की जवाबदेही सर्वोपरि है।
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