नई दिल्ली, दिल्ली
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लगभग 80 वर्षों तक शांतिवादी रक्षा नीति अपनाने वाला जापान अब अपनी सुरक्षा रणनीति में बड़े बदलाव कर रहा है। लंबे समय से लागू सैन्य प्रतिबंधों में ढील, रक्षा बजट में लगातार बढ़ोतरी और हथियारों के निर्यात की दिशा में उठाए गए कदमों ने एशिया की रणनीतिक राजनीति को नई दिशा दे दी है। इन बदलावों को लेकर सबसे अधिक चिंता चीन ने जताई है।
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जापान ने अपने संविधान और रक्षा नीतियों के तहत सैन्य गतिविधियों को सीमित रखा था। देश ने आत्मरक्षा तक अपनी सेना की भूमिका तय की थी और रक्षा खर्च को भी नियंत्रित रखा गया। इसके अलावा हथियारों के निर्यात पर भी सख्त रोक थी। अब बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा हालात के बीच जापान इन नीतियों में संशोधन कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां, पूर्वी चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव तथा उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण जापान की नई रक्षा नीति के प्रमुख कारण हैं। इसी वजह से टोक्यो अपनी सैन्य क्षमताओं को आधुनिक बनाने और मित्र देशों के साथ रक्षा सहयोग मजबूत करने पर जोर दे रहा है।
चीन ने जापान के इन कदमों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीजिंग का कहना है कि जापान को अपने युद्धकालीन इतिहास को ध्यान में रखते हुए सैन्य विस्तार से बचना चाहिए। चीन का आरोप है कि जापान का रक्षा बजट बढ़ाना और हथियार निर्यात की नीति अपनाना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती बन सकता है।
हालांकि जापान का कहना है कि उसकी नई रणनीति पूरी तरह आत्मरक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तैयार की गई है। आने वाले समय में जापान की बदली हुई रक्षा नीति का असर पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा और शक्ति संतुलन पर देखने को मिल सकता है।
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